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     हम बिल्कुल साधारण शब्दों में कह देते हैं कि महाभारत का युद्ध 18 दिन तक चला था लेकिन अगर इसी युद्ध को द्रौपदी के नजरिए से देखें तो एक बार विचार कीजिए कि द्रोपदी के लिए वह 18 दिन कितने भारी हुए होंगे , वह 18 दिन द्रोपदी को ऐसे लगे होंगे मानो उनकी पूरी उम्र इसी युद्ध में बीत गई हो ।। 

महाभारत की समाप्ति के पर्व में लिखा है कि द्रौपदी की आंखें ऐसी हो गई थी मानो किसी गड्ढे में धंस गई हों ।। आंखों के नीचे काले घेरों ने उनके रक्ताभ कपोलों को भी अपनी सीमा में ले लिया था जो कि श्याम वर्ण और अधिक काला हो गया था ।। द्रौपदी को युद्ध से पहले प्रतिशोध की ज्वाला जला रही थी और युद्ध के बाद पश्चाताप की अग्नि भस्म करने पर तुली थी ।। 

द्रौपदी के दिमाग में ना तो कुछ समझने की क्षमता बची थी और ना ही कुछ सोचने की । कुरुक्षेत्र की रणभूमि में चारों तरफ लाशों की गंध मची हुई थी, जिन के अंतिम संस्कार के लिए ना लोग उपलब्ध थे और ना ही साधन ।। 

राज्य में विधवाओं का अंबार लगा पड़ा था और पुरुष इक्का-दुक्का ही दिखाई दे रहे थे , बच्चे अनाथ घूम रहे थे और इन सब की महारानी द्रौपदी अकेली महल में शांत बैठी हुई शून्य को ताक रही थी ।। 

इतने में श्रीकृष्ण उनके महल में प्रवेश करते हुए द्रौपदी की जय हो के स्वर में आते हैं , उनकी आवाज सुनते ही द्रौपदी पागलों की तरह उनकी तरफ दौड पड़ती है और उनके चरणों से लिपटकर रोने लग जाती है ।। श्रीकृष्ण द्रोपदी के सिर को सहलाते हैं और चुप खड़े रहते हैं ।। 

द्रौपदी कहती है यह कैसे हो कैसे हो गया मधुसूदन ? मैंने तो ऐसा नहीं सोचा था ।। फिर श्रीकृष्ण मुस्कुरा कर कहते हैं नियती बहुत क्रूर होती है पांचाली ! वह हमारे सोचने के अनुसार नहीं चलती ।। तुम प्रतिशोध लेना चाहती थी और तुम सफल हुई , तुम्हें इस की बधाई हो ।। तुम्हारे इस प्रतिशोध में केवल दुर्योधन और दुशासन ही नहीं बल्कि समस्त कुरुवंश का विध्वंस हो गया है ।। द्रौपदी क्रोध भरे स्वर में कहती है तुम मेरे घाव को सहलाने आए हो या नमक छिडकने , तो कृष्ण कहते हैं : नहीं द्रौपदी मैं तो तुम्हें सत्य से अवगत कराने आया हूं ।। हम अपने कर्म के परिणाम को दूर तक नहीं देख पाते लेकिन जब उसका परिणाम सामने आता है तो हमारे पास कुछ नहीं रहता ।। 

द्रौपदी कहती है तो क्या मैं ही इस युद्ध की उत्तरदाई हूं ? 
श्रीकृष्ण नहीं द्रोपदी , तुम अकेले इस युद्ध की उत्तरदाई नहीं हो , लेकिन अगर तुम जरा सी भी अपने कर्मों के परिणाम की दूरदर्शिता रखती तो आज इतना कष्ट नहीं होता ।। 

द्रौपदी: मैं क्या कर सकती थी मधुसूदन ?
श्रीकृष्ण : अगर तुम स्वयंवर में कर्ण का अपमान नहीं करती और उसे अपनी योग्यता दिखाने का अवसर देती तो आज यह परिणाम सामने नहीं आता ।। 
जब कुंती ने तुमको पांच पतियों में बांटा , अगर तुम उनका निर्णय स्वीकार नहीं करती तो भी परिणाम यह नहीं होता । उसके बाद तुमने महल में दुर्योधन का अपमान किया , अगर तुम वह नहीं करती तो तुम्हारा चीर हरण भी नहीं होता ।। हमारे शब्द भी कर्म ही होते हैं और हमें अपना हर शब्द बोलने से पहले तोलना पड़ता है अन्यथा उनके परिणाम स्वम् को ही नहीं बल्कि पूरे समाज को भी तहस-नहस कर देते हैं ।। संसार में मनुष्य ही एकमात्र ऐसा प्राणी है जिसका जहर उसके दांतो में नहीं बल्कि शब्दों में है इसलिए अपने शब्दों का इस्तेमाल काफी सोच समझ कर करना चाहिए ।।

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